सुकून उतना ही देना, प्रभु जितने से जिंदगी चल जाए, औकात बस इतनी देना, कि, औरों का भला हो जाए, रिश्तो में गहराई इतनी हो, कि, प्यार से निभ जाए, आँखों में शर्म इतनी देना, कि, बुजुर्गों का मान रख पायें, साँसे पिंजर में इतनी हों, कि, बस नेक काम कर जाएँ, बाकी उम्र ले लेना, कि, औरों पर बोझ न बन जाएँ
किसी की "सलाह" से रास्ते जरूर मिलते हैं, पर मंजिल तो खुद की "मेहनत" से ही मिलती है ! "प्रशंसक" हमें बेशक पहचानते होंगे.. मगर "शुभचिन्तकों" की पहचान खुद को करनी पड़ती है
” इसी तरह से परिपक्व व्यक्ति की भी तीन पहचान होती है… पहली उसमें नम्रता होती है… दूसरे उसकी वाणी मे मिठास होता है और तीसरे उसके चेहरे पर आत्मविश्वास का रंग होता है….. ”