*एक महात्मा से मुलाक़ात हुई, तो मैंने गुज़ारिश की.. .... जिंदगी की कोई नसीहत दीजिये मुझे....* *उन्होंने सवाल किया, कभी बर्तन धोये हैं * *मैने हैरान होकर कहा, ....... जी धोये हैं।*
*पुछा,....क्या सीखा * *मैंने कोई जवाब नही दिया...* *वो मुस्कुराये और कहा.........* *"बर्तन को बाहर से कम और* *अंदर से ज्यादा धोना पड़ता है.......* *बस यही जिंदगी है।*
सुकून उतना ही देना, प्रभु जितने से जिंदगी चल जाए, औकात बस इतनी देना, कि, औरों का भला हो जाए, रिश्तो में गहराई इतनी हो, कि, प्यार से निभ जाए, आँखों में शर्म इतनी देना, कि, बुजुर्गों का मान रख पायें, साँसे पिंजर में इतनी हों, कि, बस नेक काम कर जाएँ, बाकी उम्र ले लेना, कि, औरों पर बोझ न बन जाएँ
मन की आंखो से प्रभु का दीदार करो दो पल का है अन्धेरा बस सुबह का *इन्तजार करो क्या रखा है आपस के बैर मे ए यारो छोटी सी है ज़िंदगी बस *हर किसी से प्यार करो *
"विचार ऐसे रखो कि तुम्हारे विचारों पर भी किसी को विचार करना पड़े, समुंदर बन कर क्या फायदा, बनना है तो छोटा तालाब बनो, जहां पर शेर भी पानी पिए, तो गर्दन झुका के..!!"