जीवन में सुख हो या दुख, सम्मान या अपमान, अंधेरा या उजाला, भीतर के तराजू को साधते चला जाए कोई, तो एक दिन उस परम संतुलन पर आ जाता है, जहां जीवन तो नहीं होता, अस्तित्व होता है; जहां लहर नहीं होती, सागर होता है; जहां 'मैं' नहीं होता, 'सब' होता है। " ~ ~ ओशो ...
अजीब रिश्ता हैं मेरा ऊपर वाले के साथ जब भी मुसीबत आती हैं न जाने किस रूप मे आता हैं हाथ पकड़ कर पार लगा देता हैं मैं उसके सामने सर झुकाता हूँ वो सबके के सामने मेरा सर उठाता हैं ।
नदी का पानी मीठा होता है क्योंकि वो पानी देती रहती है। सागर का पानी खारा होता है क्योंकि वो हमेशा लेता रहता है। नाले का पानी हमेशा दुर्गंध देता है क्योंकि वो रूका हुआ होता है।
यही जिंदगी है
देते रहोगे तो सबको मीठे लगोगे। लेते रहोगे तो खारे लगोगे। और अगर रुक गये तो सबको बेकार लगोगे।