*इंसान अपना वो चेहरा तो* *खूब सजाता है जिस पर* *लोगों की नज़र होती है.* *मगर आत्मा को सजाने की* *कोशिश कोई नही करता* जिस पर परमात्मा की नजर होती हैं।.* *।। हरि ॐ ।।*
. *जिन्दगी जब देती है,* *तो एहसान नहीं करती* *और जब लेती है तो,* *लिहाज नहीं करती*
*दुनिया में दो ‘पौधे’ ऐसे हैं* *जो कभी मुरझाते नहीं* *और* *अगर जो मुरझा गए तो* *उसका कोई इलाज नहीं।* *पहला –* *‘नि:स्वार्थ प्रेम’* *और* *दूसरा –* *‘अटूट विश्वास’*
पीपल के पत्तों जैसा मत बनिए, जो वक़्त आने पर सूख कर गिर जाते है। अगर बनना ही है, तो मेहंदी के पत्तों जैसा बनिए, जो सूखने के बाद भी, पीसने पर दूसरों की ज़िन्दगी में रंग भर देते हैं।
क्योंकि भोजन न *पचने* पर रोग बढते है...! पैसा न *पचने* पर दिखावा बढता है...! बात न *पचने* पर चुगली बढती है...! प्रशंसा न *पचने* पर अंहकार बढता है....! निंदा न *पचने* पर दुश्मनी बढती है...! राज न *पचने* पर खतरा बढता है...! दुःख न *पचने* पर निराशा बढती है...! और सुख न *पचने* पर पाप बढता है...!