भीड़ भाड़ को छोड़ आए हैं बस तन्हाई भाई है.
वहां बहुत बेचैनी भोगी यहां खुमारी छाई है.
वो सवाल अब यहां नहीं हैं जिनके उत्तर मुश्किल थे.
जितनी हमने इच्छा की थी उतनी राहत पाई है.
तेरी ज़ुल्फ़ों से जुदाई तो नहीं माँगी थी
क़ैद माँगी थी रिहाई तो नहींमाँगी थी !!
मैने क्या जुर्म किया आप ख़फ़ा हो बैठे
प्यार माँगा था ख़ुदाई तो नहीं माँगी थी !!
मेरा हक़ था तेरी आँखों की छलकती मय पर
चीज अपनी थी पराई तो नहीं माँगी थी !!
चाहने वालों को कभी तूने सितम भी न दिया
तेरी महफ़िल में रुसवाई तो नहीं माँगी थी !!
दुशमनी की थी अगर वह भी निबाहता ज़ालिम
तेरी हसरत में भलाई तो नहींमाँगी थी !!
अपने दीवाने पे इतने भी सितम ठीक नही
तेरी उलफ़त में बुराई तो नहीं माँगी थी !
हवा का ज़ोर
भी काफ़ी बहाना होता है;
अगर चिराग किसी को जलाना होता है;
ज़ुबानी दाग़ बहुत लोग करते रहते हैं;
जुनूँ के काम को कर के दिखाना होता है;
हमारे शहर में ये कौन अजनबी आया;
कि रोज़ सफ़र पे रवाना होता है;
कि तू भी याद नहीं आता ये
तो होना था;
गए दिनों को सभी को भुलाना होता है।
अपनी मर्ज़ी से कहाँ अपने सफ़र
के हम है;
रुख हवाओं का जिधर का है उधर के हम है;
पहले हर चीज़
थी अपनी मगर अब लगता है;
अपने ही घर में किसी दूसरे घर के
हम है;
वक़्त के साथ है मिट्टी का सफ़र सदियों से;
किसको मालूम कहाँ के हैं, किधर के हम हैं;
चलते रहते हैं कि चलना है मुसाफ़िर का नसीब;
सोचते रहते हैं किस राहग़ुज़र के हम है।