हवा बन कर...
हवा बन कर बिखरने से;
उसे क्या फ़र्क़ पड़ता है;
मेरे जीने या मरने से;
उसे क्या फ़र्क़ पड़ता है;
उसे तो अपनी खुशियों से;
ज़रा भी फुर्सत नहीं मिलती;
मेरे ग़म के उभरने से;
उसे क्या फ़र्क़ पड़ता है;
उस शख्स की यादों में;
मैं चाहे रोते रहूँ लेकिन;
मेरे ऐसा करने से;
उसे क्या फ़र्क़ पड़ता है।
मेरी आँखों में...
मेरी आँखों में आँसू आए ना होते;
अगर वो हमें देखकर मुस्कुराए ना होते;
सोचता हूँ अक्सर तन्हाई में मैं;
मेरी ज़िंदगी में काश वो आए ना होते;
ना तड़पते हम उनके लिए इतना;
दिल ने ख़्वाब अगर उनके सजाए ना होते;
ना टूट कर बिखरता मैं इस कदर;
अगर वो मेरे दिल में अपना घर बसाए ना होते।
कही ईसा, कहीं मौला,
कहीं भगवान रहते है;
हमारे हाल से शायद सभी अंजान रहते हैं;
चले आये, तबीयत आज
भारी सी लगी अपन
सुना था आपकी बस्ती में कुछ इंसान
रहते है।