क्यूँ तबीअत कहीं...
क्यूँ तबीअत कहीं ठहरती नहीं;
दोस्ती तो उदास करती नहीं;
हम हमेशा के सैर-चश्म सही;
तुझ को देखें तो आँख भरती नहीं;
शब-ए-हिज्राँ भी रोज़-ए-बद की तरह;
कट तो जाती है पर गुज़रती नहीं;
ये मोहब्बत है, सुन, ज़माने, सुन;
इतनी आसानियों से मरती नहीं;
जिस तरह तुम गुजारते हो फ़राज़;
जिंदगी उस तरह गुज़रती नहीं।
मेरी मेंहदी की महक तेरे तन से मिलेगी,
जद्दोज़हद में उतरी एक पायल तेरे दामन से लिपटी मिलेगी...
सुबह की हया के साथ खुलेगी जब पलके मेरी,
रात की सरगोशियाँ तेरी नजरो में मिलेगी
कितनी अजीब बात है ना जब तू मेरे पास थी तो,
हर दम ये सोचता था की क्या में तेरी कदर नहीं करता
और आज तू मेरे पास नहीं है तो है तो ये एहसास होता है की,
कदर तो हमेशा से थी मगर तुजे न खोने के यकीन ने अँधा कर दिया था.
जलते घर को देखने वालों, फूस का छप्पर आपका है;
आपके पीछे तेज़ हवा है, आगे मुकद्दर आपका है;
उस के क़त्ल पे मैं भी चुप था, मेरा नम्बर अब आया;
मेरे क़त्ल पे आप भी चुप है, अगला नंबर आपका है।
टूटे :broken_heart: जब #Dil :heart: तो #log :two_men_holding_hands: कहते है... #Tumhe उस :princess_tone1: से अच्छी अच्छी #ladki :bride_with_veil_tone1: मिलेगी... पर कोई ये #nahi :x: समझता #jarurat अच्छी :heart_eyes: की नहीं उस #ladki :bride_with_veil_tone1: की होती है... जिससे #Mohabbat :couple_with_heart: है...:heart:
जो गुमां करे इस नक्श पे, वो अक्स भी एक खाक है
जिस सादगी में नूर हो, वो हुस्न ही मेहताब है
जिस नजर में खुमार हो,जो जिगर से जांनिसार हो
जिसे जलके ही करार हो, वो इश्क ही आफताब है